बड़का किस्म के सेलिब्रेटी समाज सेवी लोगों/ मैगसेसे पाने के कुछ बेहतरीन नुस्के/ टोटके:
August 21, 2009
सामाजिक क्षेत्र के अति प्रतिष्ठित टोटका गुरु के कुछ टोटके व नुस्खे:
(भारतीय समाज की सामाजिक क्षेत्र की हकीकतों पर कटाक्ष-व्यंग्य)
प्रबुद्ध पाठकों इस लेख में कोई कमी बेसी हो तो जरूर बताईयेगा, मैं भी प्रयास करूंगा कि इस लेख को अौर परिष्कृत कर पाऊँ ताकि यह व्यंग्य लेख सत्य घटनाअों के अाधार पर लिखा होने के बावजूद किसी को सीधी चोट नहीं पहुचाता हुअा नही लगे।
हजारों लाखों नौजवान साथियों से अनुरोध हैं कि यदि अाप सच में भारतीय अाम समाज के प्रति ईमानदार हैं तो इन बड़े बड़े टोटका गुरुअों कों अपना अादर्श नहीं मानें, अापनी अाँखें खोलें अौर अपने अंदर की अात्मा की अावाज को सुने अौर समाज में काम करते रहें। भारत में पचासों मैगसेसे वाले हो चुके हैं, हर साल अौर भी विदेशी पुरस्कार लोगों को मिलते रहते हैं, इनमें से अधिकतर ऐसे ही टोटका गुरु हैं। यदि ये टोटका गुरु लोग सच मे ही भारत के लोगों के प्रति इमानदार होते तो अाज भारत की दशा ही कुछ अौर होती। भारत की ऐसी तैसी करने में नेताअों अौर ब्योरोक्रेट्स के साथ साथ इन टोटका गुरुअों का भी कोई कम हाथ नहीं। ये टोटका गुरु लोग कभी अपने अाप को नहीं बदलेंगें, टोटका गुरु होना भी एक उच्चस्तरीय स्थापित अभिजात्यीय रोजगार है जो कि ग्लोबाल ईकोनोमी की देन है अौर एक बड़ा मजबूत व्यवस्थित तंत्र है। इसलिये टोटका गुरुअों से वास्तविक सामाजिक ईमानदारी व प्रतिबद्धता की अपेक्षा करना अाखें होते हुये भी अंधे बनने जैसा ही है। साथियों अाप अपने ऊपर विश्वास करना सीखिये अौर इन टोटका गुरुअों को अपना अादर्श मानना छोड़ें, ये लोग भारतीय सामाजिक क्षेत्र की वे जोंकें हैं जो हमारा अापका ही खून चूस-चूस कर खुद को बिना कुछ किये ही बड़ा बनाते हैं।
विशेष-
यह लेख सत्य पात्रों पर अाधारित है, किंतु पात्रों के नाम बदले जा रहे हैं। जिन महापुरुष की कहानी दी जा रही है वह बहुत अादरणीय हैं अौर हम सभी के टोटका गुरू हैं, सोनिया गांधी जी ने भी कुछ नुस्खे इन्हीं टोटका गुरु से ही सीखे हैं, लेख पढ़िये मालुम पड़ेगा। टोटका गुरु बहुत ही बड़े वाले असली किसम के महापुरुष हैं। जो कि विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं अौर साथ ही साथ बहुत ही बड़का वाले कर्मठ हैं अौर दलितों के मसीहा हैं, इन्ही गुरु जी के प्रताप से अाज घूमंतू पिटारा यह नुस्खे पेश कर पा रहा है।
टोटका गुरु के टोटके/ नुस्खे-
टोटका गुरू जी यदि अाप मेरे सौभाग्य से यह पिटारा पढ़ रहे हैं तो मुझे उम्मीद है कि अाप मुझे मन ही मन अाशीर्वाद दे रहे होगें क्योंकि अापकी टोटका कला का लाभ हजारों लाखों लोग उठायेगें अौर अापको दुवायें मिलेंगी।
यह सारे नुस्के अौर टोटके अपने टोटका गुरू के खुद के अाजमाये हुये हैं। बहुतों को इनसे फायदा मिला है, कुछ लोगों कों मैगसेसे अवार्ड मिला है, इनमें से कुछ तो नोबल के जुगाड़ में लगे हैं, घूमंतू पिटारे को पूरी उम्मीद है कि इनमें से टोटका गुरु को तो नोबल जरूर मिलेगा ही मिलेगा। बहुत से लोग कई साल से टोटका कर रहे हैं। ये लोग हार नहीं मानें उम्मीद की जाती है कि भविष्य में ग्लोबल ईकॅानोमी बड़ने के साथ साथ ऐसी व्यवस्था भी बनेगी कि सभी टोटका करने वालों की जेब में दो चार मैगसेसे या इस किसम के अवार्ड पड़ें रहेंगें जिससे अखबार में छपते समय या विदेश जाने के समय या फंड पाने के समय या फंड के लिये किसी को रेको देते समय या खुद को इमानदार या किसी को बेईमान सिद्ध करते समय या बड़ी किसम की मीटिंगों में जाते रहने के लिये या हवाई यात्राअों को करते रहने जैसे अति महत्वपूर्ण अवसरों में जरूरत पड़ने पर तुरंत जेब से निकाल कर दिखाये जा सकने रुपी भोकाल टाईट करने का सुभीता भी रहेगा।
अापका अमेरिका से पढ़ा हुअा होना बहुत जरूरी है वरना लोग अापको त्यागी, ईमानदार, प्रगतिशील अौर बौद्धिक नही मानेंगें, अौर फिर बड़े व विदेशी पुरस्कारों की सेटिंग तो अमेरिका में अापके साथी कितना अापके बारे में ढोल मजीरा बजा पाते हैं इन सब बातों पर ही निर्भर करता है। अब अपने टोटका गुरु को ही लीजिये, इन्होनें अाज तक कोई भी काम जमीन में नहीं किया है फिर भी जमीनी नेता होने के सबूत के तौर पर मिला मैगसेसे अवार्ड जेब में पड़ा रहता है। यह टोटका बिलकुल भारत की अदालतों की तरह है मसलन अाप बीच चौराहे में किसी की हत्या कर दीजिये भले ही अापको हत्या करते हुये हजारों लोगों ने देखा हो किंतु यदि अापके पास ऊँचे जुगाड़ हैं अौर सेटिंग करके अापने अदालत में सबूत दे दिया कि अापने हत्या नहीं की तो फिर अाम अादमी की गवाही का कोई मतलब नहीं होता, बिलकुल उसी तरह अापके जेब में अापके जमीनी नेता अौर ईमानदार होने का एक ऐसा सबूत पड़ा होना बहुत जरूरी है जो कि अाम अादमी की पहुंच से बहुत दूर हो ताकि जरूरत पड़ने पर अाप उस सबूत को पटाक से दिखा सकें जबकि अाम अादमी क्या दिखायेगा, लीजिये अाप बाजी मार गये।
सबूत के फेवर में टोटका गुरु एक बहुत बड़ी किसम वाली बात अौर कहते हैं, उनका कहना है कि अापके पास सबूत है यह बड़ी बात है, अाप काम क्या करते हैं या नहीं करते हैं इस बात का कोई मतलब नहीं। टोटका गुरू अपने इस टोटके के फेवर मेँ बहुत ही लाजवाब तर्क पेश करते हैं, उनका कहना है कि यदि दो लोग हैं, एक काम करता है जबकि दूसरे के पास काम करने का सबूत है तो अब दुनिया भर के वे बड़का लोग जो कि अापके जमीनी होने का, अापके ईमानदार होने का, अापके कर्मठ होने का बड़का किसम का उच्चस्तरीय सबूत देते हैं, उनके पास इतना टाईम अौर संसाधन कहां हैं कि वे करोंड़ों-अरबों लोगों के पास जायें अौर जांचें कि कौन क्या कर रहा है असलियत में। इसलिये जरूरी यह है कि सबूत जेब में अा जाये, तो सारा दिमाग, सारा तिकड़म, सारी ऊर्जा केवल अौर केवल उन नुस्खों अौर टोटकों में लगानी चाहिये जिनसे सबूत मिल सके। सबूत होता है काम्पैक्ट, जेब में डाल लिया जिससे जरूरत पड़ने पर जेब से निकाल कर तुरंत दिखाया जा सकता है। अब काम को कैसे लेके घूंमा जा सकता है, जितना अधिक गहरा जमीनी काम होगा उतना ही दिखाने में दिक्कत दिखायें तो दिखायें कैसे, इसलिये काम्पैक्ट होने अौर बनाने की तकनीक को भी खास नुस्खों के रूप में अाजमाना बेहतर रहता है अौर असल में यही असली किसम वाली प्रगतिशीलता है, बाकी सारी प्रगतिशीलतायें कथित किसम वाली प्रगतिशीलतायें होतीं हैं।
टोटका गुरु के जीवंत उदाहरण से प्रेरणायें ली जा सकें, नुस्खे लिये जा सकें, असली किसम वाली ईमानदारी/प्रतिबद्धता/प्रगतिशीलता सीखी व समझी जा सके इसलिये जरूरी है कि इनके बारे में अौर भी जाना जाये।
तकरीबन 20 साल पहले टोटका गुरु ने एक बहुत ही छोटे से दलितों के गांव (गांव क्या कहियेगा, इसको एक छोटा पुरवा कहिये) में अपने रिश्तेदारों से जुगाड़ लगा के अपनी ही जाति के लोगों मतलब ब्राम्हण लोगों से कुछ जमीन ली थी। हुया यूँ कि अपने टोटका गुरु का ब्राम्हण होना बहुत लाभकारी हुअा, क्योकि एक मात्र ब्राम्हण ही तो है जो कि केवल किसी दलित को छू ले या दलित को अपने बराबर में बैठा ले या दलित के घर में खाना खा ले या दलित से हाथ मिला ले तो बड़का क्रान्तिकारी हो जाता है। टोटका गुरु भी इन्हीं नुस्खों से बड़का क्रान्तिकारी के रूप में लिये जाने लगे। मेधा पाटकर जी से गहरे पारिवारिक संबंध होना भी बहुत काम अाता है, अाप कहीं एक पाखानाघर बनवाईये अौर मेधा जी को बुला लीजिये उद्घाटन के लिये, कुछ पत्रकारों कों बुला लीजिये थोड़ा टीम टाम खड़ा कर लीजिये, मेधा जी भी खुश पत्रकारों को देखकर इधर अापका टोटका फिट हो गया बहुत बड़े किसम के काम करने का पक्का सबूत, इन्हीं सबूतों को जमा करते जाईये अौर फिर किसी विदेशी टाईप के बड़े सबूत के लिये अावेदन करिये या करवा दीजिये अौर लाईन में लग जाईये।
एक बात जरुर ध्यान रखें कि किसी को बतायें नहीं कि अापने किसी विदेशी अवार्ड के लिये पक्का जुगाड़ लगा रखा है, अवार्ड मिलने पर कुछ ऐसी बेहतरीन नौटंकी कीजिये कि भोले भाले लोगों को लगे कि दुनिया भर में छानबीन करने के बाद खूब खोजने के बाद अाप जैसे महापुरुष का चुनाव किया गया है। विश्वास कीजिये यह नुस्खा काम अाता है, टोटका गुरु के जीवन में तो यह नुस्खा बहुत ही काम अाया है। यदि अापको मैगसेसे जैसे किसम का कोई अवार्ड मिल जाये तो अपने साथियों से मैगसेसे अवार्ड को एशिया का नोबल अवार्ड इस किसम की कोई भोकालबाजी करवाते रहिये तो भोलेभाले लोग अापको परमानेन्ट देवता मानते रहेंगें। अब यदि मैगसेसे अवार्ड यदि सच में ही एशिया का नोबल होता तो फिर सभी को पता ही होता कि यह एशिया का नोबल अवार्ड है जैसे कि नोबल के बारे में सबको पता रहता है कि यह नोबल अवार्ड है। लेकिन यदि यह एशिया का नोबल ना भी हो तो भी चूंकि अापको अागे नोबल अवार्ड के लिये टोटकें करनें हैं तो अपने खास साथियों से एशिया का नोबल जरूर कहलवातें रहें, इस नुस्खे से फायदा यह होता है कि नोबल के लिये अापकी दावेदारी मजबूत होती है भोले भाले लोगों को भी यह महसूस होता है कि चूंकि अापको छोटका वाला नोबल मिल चुका है तो अब बड़का वाला अाज नहीं तो कल मिल ही जायेगा। तो लोग अापके पीछे लगे रहते हैं कि जब अापको बड़ी चासनी मिलेगी तो उनको भी कुछ बचा खुचा मिलेगा ही मिलेगा। तो इस प्रकार के लोगों की भीड़ को भी अाप अपने बड़का जमीनी नेता होने के सबूत के तौर पर पेश कर सकते हैं, अापने “इसकी टोपी उसके सर” वाली प्रसिद्ध हिन्दी फीचर फिल्म तो देखी ही होगी। यदि दुर्भाग्यवश नहीं देखी है तो जरूर देख लेंवें क्योकि अपने टोटका गुरु ने बहुत बार देखी है।
टोटका गुरु को कई साल पहले एक पैरा ऊपर वाले नुस्खे को करते रहने से मैगसेसे अवार्ड मिल गया था। किसम किसम के नुस्खों के असर के कारण टोटका गुरु को इस दलित-गांव अौर दलित सशक्तीकरण के नाम पर पचासों लाख रुपये तो मैगसेसे के पहले ही मिल चुके थे, जबकि पता नहीं क्यों बिचारे इस दलित गांव अौर इसके गांव वालों की हालतें 20 साल से दिन ब दिन पहले से अौर बदतर ही होती जा रही हैं। यहां टोटका गुरु का काम्पैक्ट नुस्खा कितना काम अाता है, क्योंकि असलियत देखने कौन अाता है, असलियत देखने की जरूरत ही नही पड़ती क्योकि टोटका गुरु की जेब में बहुत सारे बड़का किसम वाले सबूत जो पड़े हुये हैं, जहां जो सबूत फिट हो सकता है टोटका गुरु फटाक से जेब से निकाल कर तुरंत फिट कर देते हैं। अब सोचिये कि ये नुस्खे कितने बेहतरीन हैं। बताया तो कि खुद टोटका गुरु के अपने खुद के जीवन में अपनाये हुये टोटके हैं।
टोटका गुरू एक फंडिग एजेंसी के जन्मदाता भी है तो अब जो दाता है उसको को दूसरे का मूंल्यांकन करने का अधिकार तुरंत बैठे बिठाये मिल जाता है सो अपने टोटका गुरु इसी चलताऊ नुस्खे का इस्तेमाल करते हुये सामाजिक क्षेत्र में उतरने के पहले ही दिन से दूसरों का ही मूल्यांकन करते अा रहे हैं कि कौन बेईमान है, कौन ईमानदार है, कौन काम करता है या कौन काम नहीं करता है। अब चूंकि टोटका गुरु पैसा फंड करते हैं तो अब कौन माई का लाल था जो कि टोटका गुरु से पूछे कि टोटका गुरु खुद कौन सा काम करते हैं। चूंकि टोटका गुरु फंड भी देते हैं इसलिये भारत की बेरोजगारी में 10-50 लोगों की भीड़ फंड की चूसनी दिखा कर जमा करना कौन सी बड़ी बात इसलिये इन्होने एक नया नुस्खा निकाला कि जब मन अा जाये धरना करो, उपवास करो अौर यह सब करने में किराये की भीड़ तो उन लोगों से ही अा जायेगी जिनको कि ये फंड देते हैं या फंड की चूसनी दिखाते हैं। अब यदि साल में 10-20 बार सिर्फ 10-20 अादमी की भीड़ जमा करने से हर एक को लाखों रुपये का फंड हर साल मिल जाये तो फिर किसको दिक्कत है कहीं भी भीड़ ले कर पहुंच जाने में फिर किराया भाड़ा कौन सा अपनी जेब से लगना है। किराया-भाड़ा तथा अौर खर्चे के मामलों के लिये टोटका गुरु के अलग विशेष नुस्खे हैं जिनकों कि अाप सरल भाषा में अकाऊंट ऐडजेस्टमेंट के रुप में जान सकते हैं।
यहां थोड़ा सा हिंट लीजिये कि क्यूं टोटका गुरु नें अपनी संस्था को चलाने वाले लोग सिर्फ अौर सिर्फ अपने ही देखे भाले अपनी ही जाति के अपने ही रिश्तेदार लोग बना रखे हैं। यह भी एक लाजवाब नुस्खा है कि मसीहा बनो दलितों के, अवार्ड चापो दलितों के लिये काम को दिखा कर, लाखों करोंड़ों का फंड चापो दलितों के नाम पर किंतु पैसे का सारा मामला रखो अपनी ही खास जाति के अपने ही रिश्तेदार लोगों के हाथों। कोई इस बात को मुद्दा नही बनाये इसलिये दिखावटी लोकतंत्र का ढकोसला भी संस्था के अंदर करते रहना भी एक लाजवाब टोटका है। तो यही सब दिखा दिखा के अौर मीडिया मैनेज करके, टोटका गुरु ने खुद को बिना जमीन में कुछ किये ही खुद को दुनिया भर में बड़का जमीनी नेता सिद्ध करवा दिया। इनकी खुद की ईमानदारी पर कभी कोई प्रश्न उठाने की हिम्मत ना कर सके इसलिये समय समय पर दूसरों को बेईमान कहना तथा अपनी जेब में पड़े सबूतों को भी निकाल निकाल के दिखाते रहना भी इनके नुस्खे हैं।
टोटका गुरू तो जानते ही नही थे कि मैगसेसे के बाद भारत में किसी को कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती इसलिये इनको भी खुद धरने प्रदर्शन करने की जरुरत नही है इसलिये मैगसेसे मिलने के बाद भी कुछ समय तक तो खुद ही धरना प्रदर्शन किया करते रहे। फिर धीरे धीरे जब समझ में अाया कि धरना करने की खुद कोई जरूरत नहीं है, क्योकि धरना प्रदर्शन का टोटका तो टोटकागुरु मीडिया का ध्यानाकर्षण करने के लिये करते थे अौर अब तो मीडिया खुद ही खोजते हुये अाता है क्योकि टोटका गुरु की जेब में मैगसेसे जो पड़ा है। मीडिया में इनका भोकाल बना रहे इसलिये हर साल किसी ना किसी बहाने से अमेरिका घूम अाते हैं इनके घूमने का खर्चा भी अपने प्रबुद्ध अप्रवासी भारतीय लोग उठाते हैं अौर खुद को गौरवांवित भी महसूसते हैं। है ना अपने लाजवाब टोटका गुरु का लाजवाब टोटका।
बढ़ती उम्र के साथ साथ टोटका गुरु ब्रह्मज्ञानी भी होते जा रहे हैं, अब टोटका गुरु भारत की छोड़िये दुनिया की कोई भी बड़ी समस्या हो उसके लिये दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स करके समाधान का कोई नुस्खा दे देते हैं अौर प्रेस वार्ता करते ही समाधान हो जाता हैं। यदि एक बार में समाधान नही मिलता तो कुछ महीने बाद फिर दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स कर देते हैं। अब चूंकि ये हैं एक फंडिग एजेन्सी के जन्मदाता तो बहुत बेरोजगार लोग इनको मक्खन लगाते रहते हैं जिसने बड़िया प्रेस कान्फरेन्स कर दी या इनके लिये 100-50 की भीड़ जमा दी तो उसके लिये अमेरिका दो चार ठो ई-मेल मार कर पहले तो बड़का क्रान्तिकारी बताते हैं फिर कुछ तन्ख्वाह मंगा लेते हैं। अलग अलग कामों के लिये इनके पास अलग अलग किस्म के चेले हैं, जिसके उपर गुस्सा हो गये उसको बेईमान बता दिया या यह बता दिया कि फलाने अब कुछ कम कमिटेड हैं, तो तुरंत तन्ख्वाह बंद।
टोटका गुरु बिचारे समाज के लिये इतने अधिक कमिटेड हैं कि इनको कही भी कोई समस्या सुनने को मिल जाये जिसमें कि दो चार ठो प्रेस कान्फेरेन्स का जुगाड़ का टोटका बनता हो तुरंत पहूंच जाते हैं। टोटका गुरु नार्थ ईस्ट की समस्या का समाधान करने के लिये वहां दो चार प्रेस कान्फेरेन्स कर चुके हैं हो सकता हो कि दो चार NGO को फंड भी दे रहे हों ताकि प्रेस कान्फेरेऩस करते रहने का स्थायी जुगाड़ बन जाये। बिहार में 2008 में बहुत भीषढ़ बाढ़ अायी थी, टोटका गुरु लगभग 3 महीने बाद बाढ़ देखने गये थे अौर कुछ घंटे रुके थे अौर अपने वेतनभोगी लोगों से कुछ गपशप अौर हसीठठ्ठा टाईप की बातचीतें किये थे अौर फिर अपने घर लौट गये थे, घर लौटते ही बहुत लंबी रिपोर्ट लिखी थी अौर एक सच्ची रिपोर्ट कहते हुये अमेरिका के अप्रवासी भारतीयों को भेजी थी। तो टोटका गुरु इतने बड़े वाले ब्रह्मज्ञानी होते जा रहे हैं कि कुछ घंटे में गपशप मारकर ही सारी बातें समझ जाते हैं अौर समाधान भी पेश कर देते हैं, जबकि इन्हीं बातों कों समझने के लिये हमारे अाप जैसे लोगों को महीनों खपाने पड़ते हैं अौर बहुत सारी दिक्कतें झेलते हुये बहुत जगह जाना पड़ता है अौर बहुत लोगों से मिलना जुलना पड़ता है। टोटका गुरु के किसम का मतलब बड़का किसम का ब्रह्मज्ञानी होने का यह भी एक काम्पैक्ट किसम का फायदा है।
बहुत सालों से टोटका गुरु केवल मीटिंग करते रहते हैं या मीटिंग में भाग लेते हैं, इनकी मीटिग को मीटिग भी ना कहा जाये बल्कि प्रेस कान्फेरेन्स करने के लिये मीटिंग कहा जाये तो नुस्खा बेहतर तरीके से समझ में अायेगा। भारत में ही नही अमेरिका वगैरह देशों में भी मीटिंग कर अाते हैं। मीटिगों में इतना व्यस्त की महीना में कई कई बार तो हवाई यात्रायें करनी पड़ती हैं। ना ना ये कोई बिजनेसपरसन नही हैं यह तो खुद को बहुत बड़का वाला जमीनी कार्यकर्ता कहते हैं केवल कहते ही नहीं हैं इनके पास देश विदेश के बहुत सारे प्रूफ भी हैं जो इनको जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता सिद्ध करते हैं।
नोबल अवार्ड पाने की जुगत में लगे टोटका गुरु ने एक नया नुस्का निकाला है, जितने भी मुद्दे भारत में हैं जिसमे प्रेस कान्फेरेन्स का टोटका बनता हो, उन सभी में ये पहुंचने का प्रयास करते हैं, केवल कुछ काम्पैक्ट किसम की बेहद जरूरी चीजें अपनी जेब में डाल लेते हैं, मसलन मैगसेसे, फंड का जुगाड़, अमेरिका के ईमानदार किसम के असली किसम के प्रगतिशील भारतीय पत्रकारों का जुगाड़ अौर पहुच जाते हैं, अब चूकि बहुत सारे समाधान करने होते है तो तुरंत एक प्रेस कान्फेरेन्स करते हैं अौर समाधान करके अगले ही दिन या उसी दिन किसी अौर मुद्दे में किसी दूसरी प्रेस कान्फेरेन्स में समाधान देने के लिये निकल जाते हैं। हमको तो पूरा उम्मीद है कि इनके लिये एक विशेष नोबल निकाला जायेगा जिसका नाम होगा “प्रेस कान्फेरेन्स करके समाधान करने की विशिष्ट तकनीक” क्षेत्र का नोबल।
टोटका गुरु तो बीसियों सालों से दलितों के बहुत बड़े मसीहा के रूप में खुद को एक से बड़कर एक नुस्खों के दम पर प्रायोजित किये हुयें हैं,। जब कहीं कोई मुद्दा नहीं मिलता है प्रेस कान्फेरेन्स करने को तो अपनी जेब में इसी प्रकार की जरूरी ईमरजेन्सी में प्रयोग करने के लिये पड़े दलितों से जुड़े किसी मुद्दे में दो चार ठो लेख लिख मारते हैं अौर लेख लिखते समय मैगसेसे भी जेब से झलका देते हैं। यह भी सब खुद को दलित मसीहा साबित करने का टोटका हैं, जो कि टोटका गुरु जमाने से सफलतापूर्वक अाजमाते अा रहे हैं।
टोटका गुरु का कहना है कि यदि अाप कुछ ऐसा नुस्खा अाजमायें कि लोगों को लगे कि अाप बहुत कुछ बड़ा छोड़ रहे हैं जबकि वास्तव में अाप कुछ भी ना छोड़ रहे हों, तो टोटकों का असर जल्दी होता है। अपने टोटका गुरु इस कला के बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। टोटका गुरु का कहना है कि लोग अापको महापुरुष मानते रहें अौर कभी अापके द्वारा खेले जा रहे खेलों की अोर ध्यान ना ले जा पावें, इसलिये समय समय पर कुछ ऐसा दिखाते रहना बहुत जरूरी है कि अाप कुछ बहुत बड़ा त्याग कर रहे हैं जबकि वास्तव में अाप कुछ भी ना छोड़ रहे हों।
लोग कहते हैं कि सोनिया गांधी जी ने कोई पद ना लिये हुये भी सत्ता का मुख्य केंद्र बने रहने का नया नुस्खा ईजाद किया है। यह सरासर अपने टोटका गुरु का भीषण अपमान है, सुनते हैं कि टोटका गुरु इस मुद्दे पर कापी राईट का कोई बड़ा बवाल मचाने वाले हैं जिसमें कि उनको पूरा भरोसा है कि जैसे उनकी हर बात को ब्रह्मा जी की बात मानकर उनके अप्रवासी मित्र लोग ढोल मजीरा बजाते रहते हैं अौर नोबल दिलवानें के जुगाड़ में कई सालों से रात दिन लगे हुये हैं, वे लोग इस मुद्दे को भी एचीवमेंट के रूप में नोबल के जुगाड़ में जरूर पेश करेंगें। टोटका गुरु ने अपने खास अमरीकी साथियों से कह रखा है कि वे लोग जब भी टोटका गुरु के बारें में कोई बात करें तो ऐसे करें जिससे लोगों को यह लगे कि ये लोग टोटका गुरु से कोई खास जुड़ाव नहीं रखते हैं। सच तो यह है कि सोनिया जी ने कुछ बेहतरीन नुस्खे अपने टोटका गुरु से ही सीखे है। टोटका गुरु ने अपनी संस्था कागजी लिखापढ़ी में छोड़ी हो लेकिन ये तो टोटका गुरु के ही टोटकों का जुगाड़ तंत्र है कि संस्था के अंदर एक पत्ता भी टोटका गुरु की मर्जी के बिना नहीं हिलता। सोनिया जी का नुस्खा तो फेल हो सकता है क्योकि उन्होनें तो किसी गैर पर विश्वास किया है।
टोटका गुरु ने भले ही अपनी संस्था दलितों के विकास के लिये बनाई हो किंतु संस्था को चलाने के लिये टोटका गुरु ने केवल अौर केवल अपनी खास जाति अौर अपने ही रिश्तेदारों पर ही भरोसा किया हैं, अब जहां लाखों करोड़ों रुपये का मामला हो, सामाजिक सत्ता के ग्लैमर को भोगने का मामला हो तो किसी दलित पर कैसे विश्वास किया जाता है, इस प्रकार के अभिजात्यीय विश्वास तो सिर्फ अौर सिर्फ अपनी ब्राह्मण जाति अौर अपने रिश्तेदारों मे ही किया जाना चाहिये ऐसा अपने टोटका गुरु का मानना है, अौर यह टोटका उन्होनें बीसियों सालों से लागू कर रखा है, भले ही उन्होने दलित उत्थान के नाम पर मैगसेसे अवार्ड किसी जुगाड़ से हड़प लिया हो किंतु उनकी अपनी संस्था में कोई दलित उत्थान टोटका गुरु ने नहीं होने दिया है, क्योकि यदि संस्था में दलित उत्थान हो गया तो उनका अपना उत्थान रुक जायेगा।
टोटका गुरु लगातार इन्ही नुस्खों से खुद को भारतीय समाज में स्थापित किये हुये हैं अौर सामाजिक क्षेत्र के ग्लैमर का अानंद लिये जा रहे हैं। किसी की हिम्मत नहीं कि उनको छेड़े या उनसे कुछ पूंछे, क्योंकि उनके पास हर बात के लिये एक टोटका है अौर प्रेस कान्फेरेन्स का करने के बहाने खोजने के जुगाड़ हैं। वह एक निहायत चतुर खिलाड़ी हैं। ये तो सिर्फ एक टोटका गुरु की पूरी कहानी के कुछ हिस्से मात्र हैं। इन्ही एक टोटका गुरु की बहुत लंबी कहानी है अौर भारत में इन जैसे बहुत टोटका गुरु मौजूद हैं।
भारतीय समाज की सामाजिक क्षेत्र की हकीकतों पर व्यंग्य लेखन, द्वारा-
विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
21 अगस्त 2009
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Filed in Journalism
Tags: Indian-Social-Activism, Vivek-Umrao-Glendenning



September 7, 2009 at 7:31 AM
शाह आलम ने आप के ब्लाग का लिंक भेजा। ब्लाग और इसके सारोकार अच्छे लगे।
September 6, 2009 at 9:47 PM
प्रिय विवेक
काश अगर तुम रमन मैग्सेसे के बारे में लिखते कि वह क्या था वह कैसा शासक था, उसने कितने निर्दोष लोगों की हत्या की, कितना बड़ा तानाशाह था। वह कितना बड़ा लोकतंत्र का हत्यारा था, गरीबों को जानवर की तरह क्यों समझता था और मजदूरों को देश का कोढ़ क्यों कहता था?
यह भी लिखो कि वे लोग जो शांति की मूर्ति बने इसका पुरस्कार ग्रहण करते हैं वे कतने बड़े रंगे सियार हैं। वे कितना बड़ा जनता से छल कर रहे हैं।
लिखो की इसे बढ़ाने में दुनिया के तानाशाह कैसे मदद कर रहे हैं। और यह भी लिखो कि दुनिया को एक बार और तानाशाही के आदिम युग में घसीटने का यह पुरस्कार एक षणयंत्र है। जनता को इससे सतर्क होने की जरूरत है।
असल में मैग्सेसे पुरस्कार तानाशाहों को महिमामंडित करने का एक माध्यम बन चुका है वैसे ही जैसे अगर तुम्हें बुश पुरस्कार या हिटलर पुरस्कार दिया जाए तो कैसा लगेगा।
इसे लिखो तो कुछ बात बनेगी। लोगों को पता चलेगा कि रमन मैग्सेसे एक तानाशाह था तो उनके सामने ये ढोंगी खुद बेनकाब हो जाएंगे। इन्हें गलिया कर तुम अपना पक्ष कमजोर कर रहे हो। वे तुम्हें व्यक्तिगत चरित्र हनन में घसील लेंगे। और जानते हो इसमें वे पारंगत हैं।
इसलिए हे प्रभु तुम्हें तरीका बदलकर उसकी वैचारिक तोड़ पेश करनी होगी। इस तरह तुम केवल एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा कर रहे हो। और जब तुम पुरस्कार की राजनीति और उसके बारे में लिखोगे तो इस पूरे तंत्र पर हमला होगा। और यही सबसे बड़ा हमला है। लोगों को यही सही दिशा बताना है।
सदिच्छा के साथ
संदीप राउजी
August 26, 2009 at 9:25 AM
प्रिय विवेक,
मैंने आपका व्यग्य लेख पढ़ा. रोचक और धारदार लगा. हिंदी में व्यंग्य विधा एक उपेक्षित विधा है. आप और भी विषयोंपर जरूर लिखें, जैसे सामजिक या राजनैतिक व्यंग्य. यह हिंदी को एवं समाज को एक योगदान होगा.
सस्नेह,
पी. के. सिद्धार्थ
August 24, 2009 at 4:00 AM
Dude, try it in English if you want to reach a larger audience. Mother tongue is fine for sentimental reasons but English is a better vehicle for the real world outside Bihar.
August 23, 2009 at 8:13 PM
vivek
tumne bahut accha lekh liha hai tum shrey ke patra ho. par apna smay yadi rachnatamak kamo me lagao to samay ka jayda sadupyog hoga.ha santo ke bisay me bhi lekh likho par kitne admi padejnge usey mai nahi kah sakta pr man ke udgar nikal jayange.
with love
umesh rashmi rohatgi
August 23, 2009 at 5:06 PM
Thank you Vivek, Google helped me in translating your web page. The comments on the article follow in a couple of hours.
August 23, 2009 at 2:41 PM
I wish I can read hindi.
It is a beautiful language….
It’s like a language with a roof on the top.
thanks.
regards
Alex
August 23, 2009 at 2:50 PM
I am thinking to translate this article in English.
thanks,
Love,
vivek
August 23, 2009 at 1:59 PM
Sir,
aapne toh un sabhi “madhadisho” per comment kiya hai jo sirf aapne baarien me sochte hain..
sir aapko aaj-kal ke “santo”(mahatma) logo per bhi comment karna chahiye jo crore rupiya rakhe hue hain aur har city me unke farmhouse & haveli hain..lekin mahtma kahne wale sirf AC me rahte hain aur aam janta ko pagal banate hain..
August 21, 2009 at 11:05 PM
आपने बिलकुल सत्य कहा है इन टोटका गुरुओं के बारे में|
और जाति तो ब्राह्मण होनी ही चाहिए| प्रथम शर्त- इसे मैं टोटका गुरुओं के
लिए विशेष आरक्षण कहता हूँ| जो गुप्त है लेकिन सौ प्रतिशत पालन किया जाता है|
मुझे विश्वास है इस आरक्षण का विरोध कभी नहीं होगा क्यों कि इसे उठाने वाले विरले होते हैं जो वाकई इसके प्रति गंभीर हो| आपको आपके बेहतरीन आलेख के लिए …आभार …..